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वट सावित्री व्रत 2026: कब है वट सावित्री और वट पूर्णिमा? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और अखंड सौभाग्य की यह कथा

    Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पर्वों में से एक है, जो विशेष रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखा जाता है। यह व्रत देवी सावित्री के अपने पति सत्यवान के प्रति अटूट समर्पण और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है, जिन्होंने यमराज को भी अपने संकल्प के आगे झुकने पर मजबूर कर दिया था। वर्ष 2026 में वट सावित्री व्रत की महिमा और इसके अनुष्ठानों को समझने के लिए यह लेख एक संपूर्ण मार्गदर्शिका है।

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    वट सावित्री व्रत 2026: महत्वपूर्ण तिथियां और शुभ मुहूर्त

    हिंदू पंचांग के अनुसार, वट सावित्री व्रत मुख्य रूप से दो बार मनाया जाता है—एक ज्येष्ठ अमावस्या पर और दूसरा ज्येष्ठ पूर्णिमा पर।

    1. वट सावित्री अमावस्या 2026: यह व्रत शनिवार, 16 मई 2026 को रखा जाएगा। उत्तर भारतीय राज्यों में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व होता है।
      • अमावस्या तिथि प्रारंभ: 15 मई 2026 को शाम 07:41 बजे।
      • अमावस्या तिथि समाप्त: 16 मई 2026 को शाम 04:00 बजे।
    2. वट सावित्री पूर्णिमा (वट पूर्णिमा) 2026: महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में पूर्णिमा के दिन यह व्रत मनाया जाता है। वर्ष 2026 में वट पूर्णिमा रविवार, 28 जून 2026 को मनाई जाएगी।

    वट सावित्री व्रत का आध्यात्मिक महत्व

    भारतीय संस्कृति में विवाह को केवल एक सामाजिक समझौता नहीं, बल्कि सात जन्मों का एक पवित्र बंधन माना गया है। वट सावित्री व्रत इसी पवित्रता और समर्पण का उत्सव है। इस व्रत का महत्व निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

    • पति की दीर्घायु: महिलाएं अपने पति की रक्षा और लंबी उम्र के लिए यह कठिन व्रत रखती हैं, जैसे सावित्री ने सत्यवान के प्राण वापस लाए थे।
    • अखंड सौभाग्य: यह व्रत परिवार में शांति, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद लाता है।
    • स्त्री शक्ति का प्रतीक: सावित्री की कथा यह दर्शाती है कि एक महिला की इच्छाशक्ति, बुद्धि और भक्ति नियति को भी बदल सकती है।
    • वट (बरगद) वृक्ष की महिमा: बरगद का पेड़ अपनी लंबी आयु और मजबूती के लिए जाना जाता है। इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिमूर्ति) का निवास स्थान माना जाता है, जो भक्तों को आध्यात्मिक शक्ति और स्थिरता प्रदान करता है।

    वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा (Vat Savitri Vrat Katha)

    यह कथा महाभारत के वन पर्व से ली गई है और इसका उल्लेख मार्कंडेय पुराण, विष्णु पुराण और भागवत पुराण में भी मिलता है。 सावित्री का जन्म और विवाह: प्राचीन काल में मद्र देश के राजा अश्वपति और उनकी रानी नि:संतान थे। उन्होंने सूर्य देव (भगवान सावित्र) की घोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप उन्हें एक तेजस्वी पुत्री की प्राप्ति हुई, जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री अत्यंत रूपवती और बुद्धिमान थी। जब उसके विवाह का समय आया, तो उसने स्वयं अपना जीवनसाथी चुनने का निर्णय लिया। वन भ्रमण के दौरान उसकी भेंट सत्यवान से हुई, जो साल्वा देश के अंधे और निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। सत्यवान एक लकड़हारे के रूप में साधारण जीवन जी रहे थे, लेकिन सावित्री ने उनके गुणों को पहचानकर उन्हें अपना पति चुन लिया।

    नारद मुनि की भविष्यवाणी: जब सावित्री ने अपने पिता को इस चुनाव के बारे में बताया, तो देवर्षि नारद ने चेतावनी दी कि सत्यवान की आयु कम है और ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। पिता के अनुरोध के बावजूद सावित्री अपने निर्णय पर अडिग रही और उसने सत्यवान से विवाह कर लिया।

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    यमराज से साक्षात्कार और विजय: सत्यवान की मृत्यु के नियत दिन पर, वह जंगल में लकड़ियां काटने गया और सावित्री भी उसके साथ गई। अचानक सत्यवान को चक्कर आया और उसने बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री की गोद में अपना सिर रखकर प्राण त्याग दिए। उसी समय मृत्यु के देवता यमराज वहां पहुंचे।

    सावित्री ने यमराज का पीछा करना शुरू कर दिया। यमराज ने उसे वापस जाने को कहा, लेकिन सावित्री ने धर्म और कर्तव्य पर अपनी बुद्धिमत्तापूर्ण बातों से यमराज को प्रभावित किया। प्रभावित होकर यमराज ने उसे तीन वरदान मांगने को कहा (सत्यवान के जीवन को छोड़कर):

    1. उसने अपने ससुर की आंखों की रोशनी और खोया हुआ राज्य वापस मांगा।
    2. उसने अपने पिता के लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा।
    3. उसने अपने लिए सौ पुत्रों का वरदान मांगा।

    यमराज ने जैसे ही ‘तथास्तु’ कहा, उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। सावित्री एक पतिव्रता स्त्री थी और पति के बिना वह माता नहीं बन सकती थी। विवश होकर और सावित्री की भक्ति से प्रसन्न होकर यमराज को सत्यवान के प्राण वापस करने पड़े। इस प्रकार, बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवित किया।

    वट वृक्ष (बरगद) की दिव्यता और प्रतीकात्मकता

    वट वृक्ष को इसकी लंबी आयु और गहराई तक फैली जड़ों के कारण पूजा जाता है, जो वैवाहिक संबंधों में स्थिरता, सुरक्षा और समृद्धि का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से, बरगद के पेड़ को ‘त्रिमूर्ति’ (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) का साक्षात स्वरूप माना जाता है। इसकी पूजा करने से न केवल पति को लंबी आयु मिलती है, बल्कि पूरे परिवार को आध्यात्मिक शक्ति और सुरक्षा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, इसी वृक्ष के नीचे सावित्री ने यमराज के साथ संवाद कर मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी।

    वट सावित्री पूजा के लिए आवश्यक सामग्री (Puja Samagri)

    पूजा को विधिपूर्वक संपन्न करने के लिए निम्नलिखित सामग्री की आवश्यकता होती है:

    • बांस की टोकरी और पंखा
    • मौली (कच्चा सूत) – पेड़ पर लपेटने के लिए।
    • सत्यवान, सावित्री और यमराज की मूर्तियां या चित्र
    • कलश – जल से भरा हुआ।
    • पूजा की थाली: रोली, सिंदूर, अक्षत (बिना टूटे चावल), धूप, दीप और फूल।
    • भोग: भीगे हुए चने, मिठाई और ऋतु फल (जैसे आम और खरबूजा)।
    • श्रृंगार सामग्री: सुहाग की वस्तुएं जैसे मेहंदी, चूड़ियां, बिंदी आदि।

    विस्तृत पूजा विधि (Step-by-Step Vat Savitri Puja Vidhi)

    वट सावित्री की पूजा पारंपरिक रूप से तीन दिनों तक चलती है, जिसमें समर्पण और अनुशासन का पालन किया जाता है।

    प्रथम दिन (तैयारी): महिलाएं अपने घर और पूजा स्थल की सफाई करती हैं। चंदन और चावल के पेस्ट से बरगद के पेड़, सावित्री, सत्यवान और यमराज की प्रतीकात्मक छवियां बनाई जाती हैं। सावित्री और सत्यवान की मूर्तियों को एक थाली में स्थापित कर उनकी पूजा की जाती है।

    द्वितीय दिन (मुख्य व्रत और पूजा): महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और पारंपरिक लाल या पीले वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद:

    1. निर्जला व्रत: कई महिलाएं इस दिन बिना जल और अन्न के व्रत रखती हैं।
    2. वट वृक्ष की पूजा: बरगद के पेड़ के पास जाकर जल अर्पित किया जाता है और तिलक लगाया जाता है।
    3. सूत लपेटना (परिक्रमा): पेड़ के तने के चारों ओर 7 बार परिक्रमा करते हुए कच्चा सूत या मौली बांधी जाती है। यह वैवाहिक बंधन की मजबूती का प्रतीक है।
    4. कथा श्रवण: सभी महिलाएं एक साथ बैठकर सावित्री और सत्यवान की व्रत कथा सुनती हैं।
    5. पंखा झलना: बांस के पंखे से बरगद के पेड़ और सत्यवान-सावित्री को हवा दी जाती है।

    तृतीय दिन (व्रत का समापन): तीसरे दिन भी सुबह पूजा की जाती है। सूर्यास्त के बाद या अगले दिन सुबह शुभ मुहूर्त में व्रत खोला जाता है。 व्रत खोलने के लिए बरगद के पेड़ की कोपलें और भीगे हुए चने का प्रसाद लिया जाता है। पूजा के बाद महिलाएं अपने बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेती हैं।

    शक्तिशाली वट सावित्री मंत्र

    पूजा के दौरान इस मंत्र का उच्चारण करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है:

    “अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते। पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्घ्यं नमोऽस्तुते।। यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोऽसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च सम्पन्नं कुरु मा सदा।।”

    (अर्थ: हे वृक्ष देव, आप मुझे अखंड सौभाग्य और सुख प्रदान करें। मुझे पुत्र और पौत्रों का सुख दें। जिस प्रकार आपकी शाखाएं पृथ्वी पर फैली हुई हैं, उसी प्रकार मेरा परिवार भी फलता-फूलता रहे।)

    क्षेत्रीय भिन्नताएं- वट सावित्री बनाम वट पूर्णिमा

    यद्यपि अनुष्ठान और कथा एक समान हैं, लेकिन तिथियों में अंतर पाया जाता है:

    • वट सावित्री (अमावस्या): यह मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और पंजाब में प्रचलित है।
    • वट पूर्णिमा: यह महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिणी राज्यों में अधिक लोकप्रिय है। दोनों ही स्थितियों में, उद्देश्य पति की लंबी आयु और पारिवारिक समृद्धि की कामना करना है।

    वट सावित्री व्रत केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि विश्वास, धैर्य और प्रेम का उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि निस्वार्थ भक्ति और बुद्धिमत्ता से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। जब महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर रक्षा सूत्र बांधती हैं, तो वे वास्तव में अपने वैवाहिक जीवन की सुरक्षा और स्थायित्व का संकल्प लेती हैं。

    वर्ष 2026 में, अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए और इस विस्तृत पूजा विधि का पालन करते हुए, आप भी सावित्री के समान आशीर्वाद प्राप्त कर सकती हैं। “जन्म सावित्री हो”—यह आशीर्वाद प्रत्येक सुहागिन के जीवन में सुख और सौभाग्य का संचार करे