
पूर्वांचल की मिट्टी में आज भी ऐसे कई लोकपर्व जीवित हैं, जिनकी पहचान बड़े-बड़े आयोजनों से नहीं, बल्कि घर-आंगन की परंपराओं, लोकगीतों और परिवार के प्रति प्रेम से होती है। पिड़िया पर्व (Pidiya Festival) भी ऐसा ही एक पारंपरिक लोकपर्व है, जिसे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
पूर्वांचल में पिड़िया पर्व (Pidiya Festival) एक पारंपरिक लोकपर्व है, जिसे भोजपुरी समाज में विशेष महत्व दिया जाता है। इस पर्व की शुरुआत गोवर्धन पूजा के दिन होती है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। इस दौरान पिड़िया बनाने की परंपरा, Pidiya Puja Vidhi, भोजपुरी लोकगीत (Bhojpuri Folk Songs) और पिड़िया विसर्जन (Pidiya Visarjan) का विशेष महत्व होता है।
इस पर्व में बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना करती हैं। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसकी शुरुआत गोवर्धन पूजा के आसपास होती है और कई गांवों में लगभग एक महीने तक पिड़िया से जुड़ी परंपराएं निभाई जाती हैं। इस दौरान घर की दीवारों पर गोबर से पिड़िया बनाई जाती हैं, पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और अंत में विधि-विधान से उनका विसर्जन किया जाता है।
आइए जानते हैं कि पूर्वांचल में पिड़िया पर्व Pidiya Festival कैसे मनाया जाता है, इसकी पूजा की परंपरा क्या है और आज भी यह त्योहार लोगों के दिलों में क्यों बसा हुआ है।
- छठ पूजा के सूप में क्या-क्या रखें? पूरी सामग्री लिस्ट (Chhath Puja Soop Samagri List)
- छठ पूजा: कांच ही बांस के बहंगिया (Chhath: Kanch Hi Bans Ke Bahangiya)
पिड़िया पर्व क्या है?
पिड़िया पर्व पूर्वांचल का एक पारंपरिक लोकपर्व है, जिसे कई स्थानों पर पिड़िया व्रत या रुद्र व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व में बहनों और युवतियों की विशेष भूमिका होती है। वे अपने भाइयों के अच्छे स्वास्थ्य, लंबी उम्र और खुशहाल जीवन की कामना करते हुए पिड़िया से जुड़ी धार्मिक और पारिवारिक परंपराओं का पालन करती हैं।
यह त्योहार केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। इसमें भोजपुरी लोकसंस्कृति, पारंपरिक गीत, महिलाओं की सामूहिक भागीदारी और पीढ़ियों से चली आ रही पारिवारिक मान्यताएं भी शामिल हैं।
पूर्वांचल के गांवों में पिड़िया पर्व का अपना अलग ही रंग देखने को मिलता है। घरों की दीवारों पर बनी छोटी-छोटी पिड़िया, शाम के समय गूंजते लोकगीत और विसर्जन के दिन घाटों पर जुटने वाली महिलाएं इस पर्व की खास पहचान हैं।
पिड़िया पर्व कब मनाया जाता है?
पिड़िया पर्व की शुरुआत सामान्यतः दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा के दिन से मानी जाती है। इसी दिन गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाने और पूजा करने की परंपरा के साथ कई परिवारों में पिड़िया लगाने की शुरुआत भी होती है।
| पिड़िया पर्व की जानकारी | तिथि / विवरण |
|---|---|
| पर्व की शुरुआत | 10 नवंबर 2026, मंगलवार — गोवर्धन पूजा |
| पिड़िया लगाने की शुरुआत | कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा |
| पर्व की अवधि | लगभग एक महीना |
| व्रत का समापन | अगहन शुक्ल प्रतिपदा |
| पिड़िया विसर्जन | अगहन शुक्ल द्वितीया |
पिड़िया की अवधि और विसर्जन की तिथि भोजपुरी क्षेत्र की परंपरा के अनुसार निर्धारित होती है।
इसके बाद कार्तिक महीने में पिड़िया से जुड़ी पूजा और लोकगीतों की परंपरा चलती रहती है। लगभग एक महीने बाद अगहन यानी मार्गशीर्ष महीने में स्थानीय पंचांग और गांव की परंपरा के अनुसार व्रत तथा पिड़िया विसर्जन किया जाता है।
हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में पिड़िया पर्व के समापन और विसर्जन की तिथि में अंतर मिल सकता है। इसलिए अपने गांव या क्षेत्र में प्रचलित परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार तिथि की पुष्टि करना उचित है।
पूर्वांचल में पिड़िया पर्व मनाने की परंपरा
1. गोवर्धन पूजा के दिन होती है शुरुआत
पूर्वांचल में पिड़िया पर्व की शुरुआत गोवर्धन पूजा के दिन से जुड़ी हुई है। इस दिन घरों में गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाई जाती है और उसकी पूजा की जाती है।
कई गांवों में इसी गोबर का कुछ हिस्सा लेकर लड़कियां और महिलाएं घर की दीवार पर छोटी-छोटी पिड़िया बनाती हैं। ये पिड़िया इस पर्व की पहचान होती हैं।
इस तरह गोवर्धन पूजा के साथ ही घर में पिड़िया पर्व का माहौल बनने लगता है। इसके बाद निर्धारित अवधि तक पूजा, लोकगीत और दूसरी पारंपरिक रस्में निभाई जाती हैं।
| चरण / रस्म का नाम | तिथि / समय (2026) | मुख्य अनुष्ठान और परंपराएं | उपयोग की जाने वाली सामग्री | सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व | |
|---|---|---|---|---|---|
| पर्व की शुरुआत व पिड़िया लगाना | 10 नवंबर 2026, मंगलवार (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा / गोवर्धन पूजा) | गोवर्धन पूजा के दिन गोबर से गोवर्धन की आकृति बनाई जाती है और उसी गोबर के कुछ हिस्से से घर की दीवार पर भाइयों की संख्या/रीति के अनुसार छोटी-छोटी पिड़िया बनाई जाती हैं। | गोबर | भाई-बहन के प्रेम और भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि तथा मंगलमय जीवन की कामना की शुरुआत का प्रतीक। | |
| माहभर पूजा एवं लोकगीत गायन | कार्तिक माह से अगहन माह तक (लगभग एक महीना) | महिलाएं व लड़कियां एक साथ बैठकर पारंपरिक भोजपुरी पिड़िया गीत गाती हैं। रात में जागकर गीत गाने और भाइयों के लिए व्रत/कथा-श्रवण तथा विशेष भोजन/पकवान की रस्में निभाई जाती हैं। | दीवार पर बनी पिड़िया, नए चावल से बने पकवान या खीर | भोजपुरी लोकसंस्कृति व लोकगीतों की विरासत को सहेजना, महिलाओं की सामूहिक भागीदारी तथा भाई-बहन के स्नेह को सुदृढ़ करना। | |
| व्रत का समापन | अगहन (मार्गशीर्ष) शुक्ल प्रतिपदा | व्रत का विधि-विधान से समापन किया जाता है और पारंपरिक पकवान या खीर ग्रहण की जाती है। | नए चावल के पकवान, खीर | महीने भर के संयम और भाइयों की रक्षा के संकल्प की पूर्ति। | |
| पिड़िया विसर्जन | अगहन (मार्गशीर्ष) शुक्ल द्वितीया | पिड़िया को दीवार से सावधानीपूर्वक निकालकर टोकरी में रखा जाता है। महिलाएं लोकगीत गाते हुए नदी, तालाब या जलाशय पर जाती हैं, पूजा के बाद विसर्जन करती हैं और प्रसाद वितरण करती हैं। | पिड़िया, टोकरी/पात्र, चिउड़ा, मिठाई व अन्य पारंपरिक प्रसाद | लोकपर्व का विधिवत समापन, घाटों पर सामाजिक मेल-मिलाप और उत्सव का वातावरण। |
2. घर की दीवारों पर बनाई जाती हैं गोबर की पिड़िया
पिड़िया पर्व की सबसे प्रमुख पहचान गोबर से बनाई गई छोटी-छोटी आकृतियां हैं। इन्हें घर की दीवार पर एक निश्चित स्थान पर लगाया जाता है।

कई परिवारों में पिड़िया को विशेष क्रम में बनाया जाता है। कुछ स्थानों पर भाइयों की संख्या के अनुसार पिड़िया बनाने या उनकी गिनती रखने की परंपरा भी मिलती है। स्थानीय रीति के अनुसार इनके आकार और संख्या में अंतर हो सकता है।
इन पिड़ियों के माध्यम से बहनें अपने भाइयों के मंगलमय जीवन की कामना करती हैं। महीने भर इनसे जुड़ी परंपराओं का पालन किया जाता है और निर्धारित दिन पर इन्हें दीवार से हटाकर विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।
3. पिड़िया के लोकगीतों से गूंजता है गांव
पिड़िया पर्व में भोजपुरी लोकगीतों का विशेष महत्व है। कई गांवों में महिलाएं और लड़कियां एक साथ बैठकर पारंपरिक पिड़िया गीत गाती हैं।
इन गीतों में भाई-बहन का प्रेम, पारिवारिक रिश्ते, लोकजीवन और धार्मिक आस्था की झलक मिलती है। गीतों के बोल पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे हैं। परिवार की बुजुर्ग महिलाएं नई पीढ़ी को इन गीतों और उनसे जुड़ी परंपराओं से परिचित कराती हैं।
कुछ क्षेत्रों में व्रत के समापन से पहले रात में जागकर गीत गाने की परंपरा भी है। इससे यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं रहता, बल्कि महिलाओं के आपसी मेल-मिलाप और लोकसंस्कृति को जीवित रखने का अवसर बन जाता है।
4. पिड़िया व्रत और पूजा की परंपरा
पिड़िया पर्व में व्रत रखने की परंपरा कई परिवारों में प्रचलित है। बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और जीवन में आने वाली बाधाओं से रक्षा की कामना करती हैं।
व्रत की विधि हर जगह एक जैसी नहीं होती। कुछ क्षेत्रों में व्रत, कथा-श्रवण, पारंपरिक गीत और विशेष भोजन से जुड़ी रस्में निभाई जाती हैं। कहीं-कहीं व्रत के समापन पर नए चावल से बने पकवान या खीर खाने की परंपरा भी मिलती है।
इसलिए पिड़िया व्रत की सही विधि जानने के लिए अपने परिवार की पुरानी परंपरा और गांव की बुजुर्ग महिलाओं से जानकारी लेना उपयोगी होता है।
5. पिड़िया विसर्जन के दिन दिखता है उत्सव जैसा माहौल
पिड़िया पर्व का समापन विसर्जन के साथ होता है। निर्धारित दिन पर महिलाएं और युवतियां पिड़िया को सावधानी से निकालकर टोकरी या अन्य पात्र में रखती हैं और पूजा की स्थानीय परंपरा के अनुसार उसे लेकर नदी, तालाब या दूसरे जलाशय तक जाती हैं।
वहां पारंपरिक रीति से पूजा करने के बाद पिड़िया का विसर्जन किया जाता है। इस दौरान भी लोकगीत गाए जाते हैं और बहनें अपने भाइयों की मंगलकामना करती हैं।
कई गांवों में विसर्जन के दिन घाटों पर काफी चहल-पहल रहती है। परिवारों की भागीदारी, महिलाओं के समूह और आसपास लगने वाली छोटी दुकानों के कारण वातावरण उत्सव जैसा हो जाता है।
विसर्जन के बाद कुछ क्षेत्रों में चिउड़ा, मिठाई या दूसरे पारंपरिक प्रसाद का आदान-प्रदान किया जाता है। इसके साथ ही व्रत के समापन की रस्म पूरी होती है।
- करवा चौथ व्रत कथा हिंदी में: वीरावती की पूरी कहानी और पूजा का महत्व
- दिवाली के बाद घर में लक्ष्मी जी के चरण चिह्न किस दिशा में बनाएं? जानें सही तरीका और धार्मिक मान्यता
- दिवाली लक्ष्मी पूजन विधि 2026: शुभ मुहूर्त, सामग्री, मंत्र और आरती
पिड़िया पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
पिड़िया पर्व का सबसे बड़ा महत्व भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा है। जिस तरह रक्षाबंधन और भाई दूज पर बहनें अपने भाइयों की मंगलकामना करती हैं, उसी तरह पिड़िया पर्व में भी उनके सुखी और सुरक्षित जीवन की कामना की जाती है।
इस पर्व का सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है।
भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक: यह पर्व पारिवारिक रिश्तों में स्नेह, अपनापन और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करता है।
भोजपुरी लोकगीतों की विरासत: पिड़िया के गीत पूर्वांचल की लोकभाषा, लोकभावनाओं और पारंपरिक जीवनशैली को सहेजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महिलाओं की सामूहिक भागीदारी: पूजा और गीतों के माध्यम से महिलाएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती हैं।
स्थानीय परंपराओं का संरक्षण: गोबर से पिड़िया बनाने से लेकर विसर्जन तक की रस्में गांवों की पुरानी जीवनशैली और धार्मिक मान्यताओं की याद दिलाती हैं।
पिड़िया पर्व और आज की नई पीढ़ी
समय के साथ गांवों की जीवनशैली में काफी बदलाव आया है। पढ़ाई, नौकरी और रोजगार के कारण बहुत से परिवार अपने गांवों से दूर रहने लगे हैं। ऐसे में कई पारंपरिक त्योहारों और लोकगीतों को पहले की तरह सामूहिक रूप से मनाना कुछ स्थानों पर कठिन हो गया है।
फिर भी पूर्वांचल के अनेक परिवारों में पिड़िया पर्व की परंपरा आज भी निभाई जाती है। बुजुर्ग महिलाओं से गीत सीखना, बच्चों को पर्व के बारे में बताना और विसर्जन में परिवार के साथ शामिल होना इस विरासत को आगे बढ़ाने के अच्छे तरीके हैं।
यदि नई पीढ़ी इन परंपराओं को समझे और इनके पीछे छिपे पारिवारिक तथा सांस्कृतिक भाव को पहचाने, तो पिड़िया जैसे लोकपर्व आने वाले समय में भी जीवित रह सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
1. पिड़िया पर्व कहां मनाया जाता है?
पिड़िया पर्व मुख्य रूप से पूर्वी उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में प्रचलित है। बिहार के कुछ भोजपुरी क्षेत्रों में भी इसे पारंपरिक रूप से मनाया जाता है।
2. पिड़िया पर्व की शुरुआत कब होती है?
कई क्षेत्रों में इसकी शुरुआत दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा के दिन गोबर से पिड़िया बनाने के साथ होती है।
3. पिड़िया पर्व क्यों मनाया जाता है?
यह पर्व बहनों द्वारा अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और मंगलमय जीवन की कामना से जुड़ा है। यह भोजपुरी लोकसंस्कृति और भाई-बहन के प्रेम का भी प्रतीक है।
4. पिड़िया पर्व में गोबर का क्या महत्व है?
गोबर से बनी छोटी-छोटी आकृतियां इस पर्व की पारंपरिक पहचान हैं। इन्हें घर की दीवारों पर लगाकर निर्धारित अवधि तक पूजा और दूसरी स्थानीय रस्में निभाई जाती हैं।
5. पिड़िया का विसर्जन कब किया जाता है?
पिड़िया का विसर्जन सामान्यतः लगभग एक महीने की परंपरा पूरी होने पर अगहन या मार्गशीर्ष महीने में किया जाता है। सटीक तिथि क्षेत्रीय परंपरा और पंचांग के अनुसार अलग हो सकती है।
6. पिड़िया पर्व में कौन-से गीत गाए जाते हैं?
इस अवसर पर पारंपरिक भोजपुरी पिड़िया गीत गाए जाते हैं। इन गीतों में भाई-बहन का प्रेम, पारिवारिक जीवन और धार्मिक आस्था की झलक मिलती है।
निष्कर्ष
पिड़िया पर्व पूर्वांचल की ऐसी लोकपरंपरा है, जिसमें धर्म, परिवार और लोकसंस्कृति एक साथ दिखाई देते हैं। गोवर्धन पूजा के दिन गोबर से पिड़िया बनाने से लेकर महीने भर गीत गाने और अंत में विसर्जन करने तक, हर रस्म के साथ परिवार की मंगलकामना जुड़ी होती है।
आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पुरानी परंपराएं धीरे-धीरे सीमित होती जा रही हैं, तब पिड़िया पर्व की जानकारी को सुरक्षित रखना और अगली पीढ़ी तक पहुंचाना और भी जरूरी हो जाता है।
पूर्वांचल की पहचान केवल उसके इतिहास और भाषा से नहीं, बल्कि पिड़िया जैसे लोकपर्वों से भी है। इन परंपराओं को सहेजना अपनी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने जैसा है।
- खरना का प्रसाद कैसे बनाएं? छठ पूजा में गुड़ की खीर और रोटी बनाने की विधि (Kharna Prasad Recipe)
- छठ पूजा 2026 का मुहूर्त: जानें नहाय-खाय, खरना, संध्या अर्घ्य और उषा अर्घ्य की तारीख
- छठ पूजा 2026 की पूजा सामग्री लिस्ट: नहाय-खाय से उषा अर्घ्य तक पूरी तैयारी