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शिवोहम् शिवोहम् Lyrics: निर्वाण षट्कम् के संपूर्ण श्लोक, हिंदी अर्थ और महत्व

    Shivoham Shivoham Lyrics
    Shivoham Shivoham Lyrics

    शिवोहम् शिवोहम् केवल दो शब्दों का मंत्र-जप नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत की एक गहरी आध्यात्मिक अभिव्यक्ति है। इसका संबंध निर्वाण षट्कम् (Nirvana Shatakam) से है, जिसे परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से जोड़ा जाता है। इस रचना को आत्म षट्कम् के नाम से भी जाना जाता है। इसके प्रत्येक श्लोक के अंत में “चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्” आता है।

    यहाँ पढ़िए Shivoham Shivoham Lyrics in Sanskrit, उनका सरल हिंदी अर्थ और “शिवोऽहम्” का आध्यात्मिक भाव।

    शिवोहम् शिवोहम् का अर्थ क्या है?

    “शिवोऽहम्” का सामान्य अर्थ है—“मैं शिव हूँ।”

    लेकिन निर्वाण षट्कम् के अद्वैत वेदांत संदर्भ में इसका अर्थ केवल यह नहीं है कि व्यक्ति स्वयं को भगवान शिव के एक भौतिक रूप के समान बता रहा है। यहाँ “शिव” को चेतना, आनंद और परम सत्य के संदर्भ में समझा जाता है।

    “चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्” का भाव है—

    मैं चेतना और आनंद के स्वरूप वाला हूँ; मैं शिव हूँ, मैं शिव हूँ।

    निर्वाण षट्कम् में साधक अपने आपको मन, बुद्धि, अहंकार, इंद्रियों और शरीर जैसी सीमित पहचानों से अलग करते हुए अपने वास्तविक स्वरूप की ओर संकेत करता है।

    शिवोहम् शिवोहम् Lyrics — निर्वाण षट्कम्

    ॥ निर्वाण षट्कम् ॥

    मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं
    न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
    न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ १॥

    न च प्राणसंज्ञो न वै पञ्चवायुः
    न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोशः।
    न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायुः
    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ २॥

    न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहौ
    मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
    न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ३॥

    न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
    न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
    अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ४॥

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    न मृत्युर्न शङ्का न मे जातिभेदः
    पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
    न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्यः
    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ५॥

    अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
    विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
    न चासङ्गतं नैव मुक्तिर्न मेयः
    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥ ६॥

    निर्वाण षट्कम् के छह श्लोकों में आत्मस्वरूप को शरीर, मन, इंद्रियों, भावनाओं और अन्य सीमित पहचानों से अलग करके देखने की शिक्षा दिखाई देती है।

    पहले श्लोक का सरल हिंदी अर्थ

    पहले श्लोक में साधक कहता है कि मैं मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त नहीं हूँ। मैं कान, जीभ, नाक और आंख जैसे इंद्रिय-उपकरण भी नहीं हूँ।

    मैं आकाश, पृथ्वी, अग्नि और वायु भी नहीं हूँ।

    अंत में वह अपने वास्तविक स्वरूप की ओर संकेत करते हुए कहता है—

    “चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्”

    अर्थात मेरा वास्तविक स्वरूप चेतना और आनंद है।

    दूसरे श्लोक में क्या कहा गया है?

    दूसरे श्लोक में प्राण, पंचवायु, शरीर के सात धातु, पंचकोश तथा कर्मेंद्रियों से अपनी वास्तविक पहचान को अलग किया गया है।

    इसका भाव यह है कि हमारा वास्तविक स्वरूप केवल शरीर या शरीर में होने वाली जैविक गतिविधियों तक सीमित नहीं है।

    फिर वही निष्कर्ष आता है—

    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

    तीसरे श्लोक का भाव

    तीसरे श्लोक में राग, द्वेष, लोभ, मोह, मद और मत्सर जैसे भावों से स्वयं को अलग बताया गया है।

    यहाँ साधक यह समझने का प्रयास करता है कि उसके भीतर उत्पन्न होने वाले भाव ही उसका अंतिम और वास्तविक स्वरूप नहीं हैं।

    निर्वाण षट्कम् इसी प्रकार धीरे-धीरे बाहरी और मानसिक पहचानों से आगे बढ़ने की दिशा दिखाता है।

    चौथे श्लोक का अर्थ

    चौथे श्लोक में पुण्य-पाप, सुख-दुःख, मंत्र, तीर्थ, वेद और यज्ञ आदि के संदर्भ में भी आत्मस्वरूप को सीमित नहीं माना गया है।

    इसका उद्देश्य धार्मिक कर्मों को नकारना नहीं, बल्कि यह संकेत करना है कि आत्मा की वास्तविक पहचान इन सभी सीमित अवधारणाओं से परे है।

    पाँचवें श्लोक का भाव

    पाँचवें श्लोक में मृत्यु, भय, जातिगत भेद, माता-पिता, जन्म, मित्र, संबंध और गुरु-शिष्य जैसी पहचान से परे आत्मस्वरूप की चर्चा होती है।

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    यह श्लोक व्यक्ति को उसकी सामाजिक और शारीरिक पहचान से आगे देखने का आध्यात्मिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

    छठे श्लोक में “शिवोहम्” का चरम भाव

    अंतिम श्लोक में आत्मा को निर्विकल्प और निराकार स्वरूप के रूप में बताया गया है।

    यहाँ “शिवोहम्” का भाव अपने सबसे व्यापक रूप में सामने आता है।

    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

    अर्थात चेतना और आनंद के स्वरूप में स्थित वही परम सत्य मेरा वास्तविक स्वरूप है।

    शिवोहम् मंत्र का आध्यात्मिक महत्व

    “शिवोहम्” का महत्व मुख्य रूप से आत्मचिंतन और आत्मबोध से जुड़ा हुआ है। निर्वाण षट्कम् अद्वैत वेदांत की उस विचारधारा को सामने रखता है जिसमें आत्मा की वास्तविक प्रकृति को शरीर और मन से अलग समझने का प्रयास किया जाता है।

    इसी कारण “शिवोहम् शिवोहम्” का जाप कई लोग ध्यान और आध्यात्मिक साधना के संदर्भ में करते हैं।

    शिवोहम् शिवोहम् का जाप कब कर सकते हैं?

    इस मंत्र या निर्वाण षट्कम् का पाठ किसी भी शांत समय में किया जा सकता है। विशेष रूप से लोग इसे:

    • प्रातःकाल ध्यान के समय
    • संध्या के समय
    • भगवान शिव की उपासना के दौरान
    • महाशिवरात्रि के अवसर पर
    • ध्यान और आत्मचिंतन के समय

    पढ़ते या सुनते हैं।

    यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि किसी मंत्र के आध्यात्मिक प्रभावों के बारे में अलग-अलग परंपराओं में अलग मान्यताएँ हो सकती हैं। इसलिए इसे मुख्यतः ध्यान, जप और आत्मचिंतन की साधना के रूप में समझना उचित है।

    शिवोहम् और भगवान शिव में क्या संबंध है?

    “शिवोहम्” का शाब्दिक अर्थ “मैं शिव हूँ” है, लेकिन निर्वाण षट्कम् के संदर्भ में इसका दार्शनिक अर्थ अधिक व्यापक है।

    अद्वैत वेदांत में “शिव” को केवल एक देवता के रूप में देखने के बजाय परम चेतना और शुभ स्वरूप के संदर्भ में भी समझा जाता है। इसी कारण “शिवोहम्” आत्मा और परम सत्य की एकता की ओर संकेत करने वाला वाक्य माना जाता है।

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    क्या शिवोहम् और “Shivoham” एक ही गीत है?

    यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

    निर्वाण षट्कम् का “शिवोऽहम्” एक प्राचीन संस्कृत स्तोत्र का अंतिम refrain है, जिसे परंपरागत रूप से आदि शंकराचार्य से संबद्ध किया जाता है।

    वहीं Kailash Kher का “Shivoham” एक अलग आधुनिक शिव भजन है, जिसके गीतकार और संगीतकार Kailash Kher हैं। इसलिए इंटरनेट पर “Shivoham Lyrics” खोजते समय दोनों को एक ही रचना नहीं समझना चाहिए।

    शिवोहम् शिवोहम् Lyrics — मुख्य पंक्ति

    चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

    यही पंक्ति निर्वाण षट्कम् के प्रत्येक श्लोक के अंत में आती है और पूरी रचना के केंद्रीय आध्यात्मिक भाव को व्यक्त करती है।

    निष्कर्ष

    शिवोहम् शिवोहम् निर्वाण षट्कम् की सबसे प्रसिद्ध पंक्तियों में से एक है। छह श्लोकों की यह रचना साधक को शरीर, मन, इंद्रियों, भावनाओं और अन्य सीमित पहचानों से आगे अपने वास्तविक स्वरूप को समझने की दिशा में ले जाती है।

    “चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्” का संदेश आत्मचिंतन, चेतना और आनंद के स्वरूप की ओर संकेत करता है।

    यदि आप Shivoham Shivoham Lyrics in Hindi, Nirvana Shatakam Lyrics, Shivoham Mantra, निर्वाण षट्कम् का हिंदी अर्थ या आदि शंकराचार्य के स्तोत्र खोज रहे हैं, तो यह रचना उन सभी संदर्भों से जुड़ी हुई है।