मैं भगवान श्रीहरि के पावन चरण-कमलों की वंदना करता हूँ। उनकी कृपा इतनी अद्भुत और अपार है कि असंभव भी संभव बन जाता है। जिस व्यक्ति में चलने की शक्ति नहीं होती, वह भी उनकी कृपा से पर्वतों को पार कर जाता है। जो नेत्रहीन है, वह भी उनके आशीर्वाद से समस्त संसार को देख पाता है।भगवान की महिमा ऐसी है कि जो बहरा है, वह सुनने लगता है और जो गूँगा है, वह बोल उठता है। इतना ही नहीं, उनकी कृपा से एक निर्धन व्यक्ति भी राजा के समान सम्मान और वैभव प्राप्त कर सकता है। भक्त सूरदास जी कहते हैं कि ऐसे करुणामय, दयालु और कृपालु स्वामी के चरणों में मैं बार-बार नमन करता हूँ। उनके चरणों की शरण ही सच्चा सुख और जीवन का परम लक्ष्य है।
चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कौं सब कछु दरसाइ॥
बहिरौ सुनै, गूँग पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराइ।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तिहिं पाइ॥
चरन-कमल बंदौं हरि-राइ।
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