स्वस्ति मंत्र: स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः पाठ, अर्थ, स्वस्तिवाचन और महत्व
“ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः…” से शुरू होने वाला स्वस्ति मंत्र वैदिक परंपरा में मंगल, कल्याण और शुभता की प्रार्थना से जुड़ा प्रसिद्ध मंत्र है। पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ और अन्य शुभ धार्मिक अवसरों पर आपने इस मंत्र का पाठ अवश्य सुना होगा।
स्वस्ति मंत्र को कई लोग स्वस्तिक मंत्र, स्वस्तिवाचन मंत्र या स्वस्ति वाचन मंत्र के नाम से भी खोजते हैं। हालांकि स्वस्तिक एक धार्मिक प्रतीक है और स्वस्ति मंत्र एक वैदिक मंत्र—दोनों को एक ही समझना सही नहीं है।
- ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि: रुद्र गायत्री मंत्र का अर्थ और जाप विधि
- बाबा खाटू श्याम आरती Khatu Shyam Aarti Hindi English
इस लेख में जानिए स्वस्ति मंत्र का संस्कृत पाठ, हिंदी अर्थ, शब्दार्थ, English transliteration, स्वस्तिवाचन क्या है, इसे कब पढ़ा जाता है और इसके पीछे की वैदिक भावना क्या है।
स्वस्ति मंत्र क्या है?
स्वस्ति मंत्र एक वैदिक मंगलकामना मंत्र है, जिसमें इंद्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से कल्याण की प्रार्थना की गई है।
इसका प्रसिद्ध मंत्र इस प्रकार है—
॥ स्वस्ति मंत्र ॥
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
यह मंत्र ऋग्वेद के 1.89.6 मंत्र के रूप में मिलता है।
Swasti Mantra in English
Om Swasti Na Indro Vriddhashravah
Swasti Nah Pusha Vishvavedah
Swasti Nas Tarkshyo Arishtanemih
Swasti No Brihaspatir Dadhatu
Om Shantih Shantih Shantih
यह पाठ संस्कृत मंत्र के रोमन लिप्यंतरण के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
स्वस्ति मंत्र का सरल हिंदी अर्थ
इस मंत्र में अलग-अलग देव शक्तियों से हमारे कल्याण और मंगल की प्रार्थना की गई है।
भावार्थ:
महान यश वाले इंद्र हमारा कल्याण करें। विश्व के ज्ञाता और पोषण करने वाले पूषा हमारा कल्याण करें। तार्क्ष्य हमारा मंगल करें और बृहस्पति हमें कल्याण प्रदान करें।
इस मंत्र का मूल भाव केवल व्यक्तिगत सुख की कामना तक सीमित नहीं है। इसमें मंगल, सुरक्षा, कल्याण और शांति की व्यापक भावना दिखाई देती है।
स्वस्ति मंत्र का शब्दार्थ
| शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| स्वस्ति | कल्याण, मंगल, शुभता |
| नः | हमारा / हमारे लिए |
| इन्द्रः | इंद्र देव |
| वृद्धश्रवाः | महान यश वाले |
| पूषा | पूषा देव |
| विश्ववेदाः | सबको जानने वाले |
| तार्क्ष्यः | तार्क्ष्य |
| अरिष्टनेमिः | जिसकी गति/चक्र को क्षति न हो |
| बृहस्पतिः | बृहस्पति देव |
| दधातु | प्रदान करें / स्थापित करें |
मंत्र के अलग-अलग पदों की व्याख्या में इंद्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से कल्याण की प्रार्थना का भाव मिलता है।
“स्वस्ति” शब्द का अर्थ क्या है?
स्वस्ति शब्द का सामान्य अर्थ है—कल्याण, मंगल, शुभता या अच्छी स्थिति।
इसी कारण स्वस्ति मंत्र का पाठ करते समय मंगल और कल्याण की भावना प्रमुख रहती है।
स्वस्तिवाचन की व्याख्या में भी “स्वस्ति” को कल्याण के अर्थ में बताया गया है और शुभ कार्यों के आरंभ में इसके पाठ की वैदिक परंपरा का उल्लेख मिलता है।
स्वस्तिवाचन क्या होता है?
शुभता, कल्याण और मंगल की कामना करते हुए वैदिक मंत्रों का पाठ करना स्वस्तिवाचन कहलाता है।
धार्मिक अनुष्ठान में स्वस्तिवाचन का उद्देश्य वातावरण को मंगलमय बनाने और सभी के कल्याण की प्रार्थना करना माना जाता है।
इसीलिए पूजा या किसी शुभ संस्कार के दौरान जब पुरोहित वैदिक मंगल मंत्रों का उच्चारण करते हैं, तो उसे स्वस्तिवाचन के रूप में जाना जाता है।
स्वस्ति मंत्र और स्वस्तिक मंत्र में क्या अंतर है?
यह सवाल बहुत से लोगों के मन में आता है।
स्वस्ति मंत्र एक वैदिक मंगलकामना मंत्र है, जबकि स्वस्तिक एक शुभ प्रतीक है।
दोनों का संबंध मंगल और शुभता की भावना से है, लेकिन दोनों एक ही चीज नहीं हैं।
इसलिए “स्वस्तिक मंत्र” इंटरनेट पर प्रचलित एक खोज-शब्द हो सकता है, जबकि मंत्र का अधिक सटीक नाम स्वस्ति मंत्र या स्वस्तिवाचन मंत्र है।
स्वस्ति मंत्र कब पढ़ा जाता है?
स्वस्ति मंत्र का पाठ विभिन्न शुभ अवसरों पर किया जाता है। उदाहरण के लिए—
- पूजा-पाठ के समय
- हवन और यज्ञ में
- गृहप्रवेश के अवसर पर
- विवाह जैसे शुभ संस्कारों में
- धार्मिक अनुष्ठान के आरंभ में
- मंगल कार्यों के अवसर पर
- शांति और कल्याण की प्रार्थना के समय
वैदिक परंपरा में स्वस्तिवाचन को शुभ कर्मों के आरंभ से जोड़ा गया है।
क्या स्वस्ति मंत्र का पाठ घर पर कर सकते हैं?
हाँ, श्रद्धा के साथ इस मंत्र का पाठ किया जा सकता है।
यदि आप घर पर पूजा कर रहे हैं तो मंत्र का उच्चारण धीरे, स्पष्ट और ध्यानपूर्वक करना बेहतर है। मंत्र का अर्थ समझकर पाठ करने से उसके भाव को मन में धारण करना भी आसान होता है।
किसी विशेष वैदिक अनुष्ठान में पाठ की विधि अलग हो सकती है, इसलिए कर्मकांड की विस्तृत विधि के लिए योग्य आचार्य की परंपरा का पालन किया जा सकता है।
स्वस्ति मंत्र का पाठ कैसे करें?
स्वस्ति मंत्र के पाठ के लिए किसी विशेष दिखावे की आवश्यकता नहीं है। सामान्य रूप से—
- शांत और स्वच्छ स्थान पर बैठें।
- कुछ क्षण मन को शांत करें।
- भगवान का स्मरण करें।
- मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करें।
- मंत्र के अर्थ और मंगलकामना के भाव को मन में रखें।
- अंत में “ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः” का उच्चारण करें।
यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और एकाग्रता है।
स्वस्ति मंत्र में किन देवताओं से प्रार्थना की गई है?
मंत्र में चार प्रमुख देव शक्तियों का उल्लेख मिलता है—
1. इंद्र
मंत्र में महान यश वाले इंद्र से हमारे कल्याण की प्रार्थना की गई है।
2. पूषा
पूषा का उल्लेख विश्व के ज्ञाता के रूप में आता है और उनसे भी स्वस्ति अर्थात कल्याण की कामना की गई है।
3. तार्क्ष्य
तार्क्ष्य का उल्लेख “अरिष्टनेमि” विशेषण के साथ किया गया है। इसकी व्याख्या परंपरागत रूप से ऐसे रूप में की जाती है जिसकी गति या चक्र को क्षति न पहुंचे।
4. बृहस्पति
मंत्र के अंतिम चरण में बृहस्पति से कल्याण प्रदान करने की प्रार्थना की गई है।
स्वस्ति मंत्र का मुख्य भाव क्या है?
अगर पूरे मंत्र को एक सरल भावना में समझें तो इसका संदेश है—
“हमारे जीवन में मंगल, कल्याण और शांति बनी रहे।”
यह मंत्र केवल किसी एक व्यक्ति के लिए प्रार्थना करने के बजाय व्यापक कल्याण की भावना से जुड़ा हुआ है। इसी कारण इसे शुभ अवसरों पर पढ़े जाने वाले वैदिक मंत्रों में महत्वपूर्ण स्थान मिलता है।
स्वस्ति मंत्र के साथ शांति पाठ
स्वस्ति मंत्र के अंत में सामान्य रूप से यह शांति मंत्र बोला जाता है—
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
तीन बार “शान्तिः” का उच्चारण शांति की प्रार्थना के भाव को व्यक्त करता है।
पूजा-पाठ में शांति मंत्रों का प्रयोग अनुष्ठान के मंगल और शांति की भावना को व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
स्वस्ति मंत्र और “भद्रं कर्णेभिः” मंत्र
ऋग्वेद के इसी सूक्त में स्वस्ति मंत्र के बाद एक प्रसिद्ध मंत्र आता है—
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः…”
इसमें देवताओं से शुभ सुनने, शुभ देखने और स्वस्थ अंगों के साथ देवहित में जीवन बिताने की प्रार्थना की गई है। ऋग्वेद 1.89 में स्वस्ति मंत्र के बाद यह मंत्र भी दिया गया है।
इस कारण स्वस्ति मंत्र को केवल एक अलग मंत्र के रूप में देखने के बजाय उसके वैदिक संदर्भ के साथ समझना अधिक उपयोगी है।
Swasti Mantra FAQ
स्वस्ति मंत्र क्या है?
स्वस्ति मंत्र एक वैदिक मंगलकामना मंत्र है, जिसका प्रसिद्ध पाठ “ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः…” से शुरू होता है।
स्वस्ति मंत्र किस वेद में है?
यह मंत्र ऋग्वेद 1.89.6 में मिलता है।
स्वस्ति मंत्र का अर्थ क्या है?
इसका मुख्य भाव इंद्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से कल्याण और मंगल की प्रार्थना करना है।
स्वस्तिवाचन क्या है?
शुभता और कल्याण की कामना करते हुए वैदिक मंत्रों का पाठ करना स्वस्तिवाचन कहलाता है।
स्वस्ति मंत्र कब पढ़ना चाहिए?
इसे पूजा, हवन, यज्ञ, गृहप्रवेश, विवाह और अन्य शुभ धार्मिक अवसरों पर स्वस्तिवाचन के रूप में पढ़ा जाता है।
क्या स्वस्ति मंत्र और स्वस्तिक एक ही हैं?
नहीं। स्वस्तिक एक शुभ प्रतीक है, जबकि स्वस्ति मंत्र एक वैदिक मंगलकामना मंत्र है।
क्या स्वस्ति मंत्र घर पर पढ़ सकते हैं?
हाँ, श्रद्धा और ध्यान के साथ इसका पाठ घर पर भी किया जा सकता है।
स्वस्ति मंत्र की शुरुआत किन शब्दों से होती है?
इसकी शुरुआत “ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः” से होती है।
निष्कर्ष
स्वस्ति मंत्र “ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः…” वैदिक परंपरा में मंगल और कल्याण की भावना से जुड़ा महत्वपूर्ण मंत्र है। ऋग्वेद के 1.89.6 मंत्र में इसका मूल पाठ मिलता है।
पूजा, हवन, यज्ञ और अन्य शुभ अवसरों पर इसका पाठ स्वस्तिवाचन के रूप में किया जाता है। इसका संदेश सरल है—जीवन में मंगल, कल्याण और शांति की कामना।
यदि आप इस मंत्र का पाठ करें तो केवल शब्दों का उच्चारण ही नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी “सबके कल्याण” की भावना को समझना भी महत्वपूर्ण है।
ॐ स्वस्तिः।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥