Skip to content

वेदसार शिव स्तवः शुद्ध पाठ, सरल हिंदी भावार्थ और शिव तत्व का आध्यात्मिक अर्थ

    वेदसार शिव स्तवः भगवान शिव के साकार और निराकार दोनों स्वरूपों का स्मरण कराने वाला एक भक्तिपूर्ण स्तोत्र है। इसमें भगवान शिव को पशुपति, विश्वनाथ, नीलकंठ, त्रिनेत्र, पंचवक्त्र, महेश्वर और परमात्मा जैसे विभिन्न स्वरूपों में संबोधित किया गया है।

    स्तोत्र के प्रारंभिक श्लोकों में भगवान शिव के पारंपरिक स्वरूप का वर्णन मिलता है, जबकि आगे के श्लोकों में उन्हें निराकार, सर्वव्यापी, अजन्मा और अद्वैत परम तत्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

    इस लेख में प्रत्येक श्लोक का संस्कृत पाठ, सरल हिंदी भावार्थ और महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या दी गई है, ताकि पाठक केवल स्तोत्र का पाठ ही न करें बल्कि उसके भाव को भी समझ सकें।

    संपादकीय टिप्पणी: नीचे दिया गया हिंदी भावार्थ संस्कृत श्लोकों को सरल भाषा में समझाने के उद्देश्य से लिखा गया है। धार्मिक ग्रंथों और स्तोत्रों की अलग-अलग परंपराओं में कुछ शब्दों या भावों की व्याख्या भिन्न हो सकती है।

    People also read

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 1

    पशूनां पतिं पापनाशं परेशं
    गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् ।
    जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
    महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥१॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    मैं उन महादेव का स्मरण करता हूँ जो समस्त जीवों के स्वामी पशुपति और परमेश्वर के रूप में वंदनीय हैं।

    वे गजचर्म धारण करने वाले तथा श्रेष्ठ और पूजनीय हैं। उनकी जटाओं में पवित्र गंगा का निवास माना गया है। वे स्मरारि, अर्थात कामदेव का दमन करने वाले भगवान शिव हैं।

    प्रमुख शब्दों का अर्थ

    पशुपति — समस्त जीवों के स्वामी
    गाङ्गवारि — गंगा का पवित्र जल
    स्मरारि — कामदेव का दमन करने वाले
    महादेव — भगवान शिव का प्रमुख नाम

    इस श्लोक में शिव के उस स्वरूप का स्मरण किया गया है जो भक्त के लिए करुणामय, शक्तिशाली और पूजनीय है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 2

    महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं
    विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।
    विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं
    सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥२॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    मैं उन महेश्वर की स्तुति करता हूँ जो देवताओं के भी स्वामी हैं और जिन्हें सर्वव्यापी विभु तथा विश्वनाथ कहा गया है।

    उनका शरीर पवित्र भस्म से अलंकृत है। वे विरूपाक्ष और त्रिनेत्रधारी हैं। उनके तीन नेत्रों का संबंध चंद्रमा, सूर्य और अग्नि से बताया गया है।

    वे सदानंद स्वरूप प्रभु हैं और पंचवक्त्र अर्थात पंचमुखी स्वरूप में भी उनका स्मरण किया जाता है।

    प्रमुख शब्दों का अर्थ

    महेश — महान ईश्वर
    विभु — सर्वव्यापी
    विश्वनाथ — विश्व के नाथ
    त्रिनेत्र — तीन नेत्रों वाले
    पञ्चवक्त्र — पांच मुख वाले स्वरूप

    यह श्लोक भगवान शिव के दिव्य, सर्वव्यापी और त्रिनेत्रधारी स्वरूप का वर्णन करता है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 3

    गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं
    गवेन्द्राधिरूढं गणातीतरूपम् ।
    भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं
    भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥३॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    मैं उन भगवान शिव की भक्ति करता हूँ जिन्हें गिरीश, अर्थात पर्वतों के स्वामी कहा गया है।

    उनका कंठ नीलवर्ण होने के कारण वे नीलकंठ कहलाते हैं। वे वृषभ पर आरूढ़ स्वरूप में पूजित होते हैं और गणों से परे उनके व्यापक स्वरूप का वर्णन किया गया है।

    वे भास्वर स्वरूप हैं, उनका शरीर पवित्र भस्म से अलंकृत है और वे माता भवानी के पति हैं। ऐसे पंचवक्त्र भगवान शिव का मैं स्मरण करता हूँ।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 4

    शिवाकान्त शम्भो शशाङ्कार्धमौले
    महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन् ।
    त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूप
    प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥४॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    हे शिवाकांत, हे शंभु, हे चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले महेशान! हे त्रिशूलधारी और जटाजूट धारण करने वाले प्रभु!

    आप सम्पूर्ण जगत में व्याप्त विश्वरूप हैं। आप पूर्ण स्वरूप हैं। हे प्रभु, मुझ पर कृपा करें और प्रसन्न हों।

    आध्यात्मिक भाव

    इस श्लोक में भगवान शिव को किसी एक स्थान या रूप तक सीमित न मानकर सम्पूर्ण जगत में व्याप्त विश्वरूप के रूप में स्मरण किया गया है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 5

    परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं
    निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम् ।
    यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
    तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥५॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    मैं उस एक परमात्मा की उपासना करता हूँ जिन्हें जगत का आदि बीज और मूल कारण कहा गया है।

    वे इच्छाओं से परे और निराकार हैं तथा ॐकार के माध्यम से जानने योग्य परम तत्व के रूप में वर्णित हैं।

    जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है, जिसके द्वारा इसका पालन होता है और अंततः जिसमें यह सम्पूर्ण जगत विलीन हो जाता है, मैं उसी परमेश्वर का स्मरण करता हूँ।

    यह श्लोक भगवान शिव के उस स्वरूप की ओर संकेत करता है जिसे भक्त परंपरा में सृष्टि के मूल और परम सत्ता के रूप में देखा जाता है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 6

    न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्
    न चाकाश आस्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
    न ग्रीष्मो न शीतो न देशो न वेषो
    न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्ति तमीडे ॥६॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    मैं उस परम स्वरूप की स्तुति करता हूँ जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंचतत्वों से परे बताया गया है।

    जो तंद्रा और निद्रा से परे है तथा गर्मी और सर्दी जैसे द्वंद्वों से भी अतीत है।

    जिसकी कोई निश्चित भौतिक आकृति या बाहरी वेश से बंधी पहचान नहीं है, उस परम स्वरूप को मैं प्रणाम करता हूँ।

    आध्यात्मिक भाव

    यह श्लोक भगवान शिव के निराकार और सीमाओं से परे स्वरूप का चिंतन कराता है। यहां शिव को केवल किसी दृश्य आकृति के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक परम तत्व के रूप में देखा गया है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 7

    अजं शाश्वतं कारणं कारणानां
    शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।
    तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं
    प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥७॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    मैं उस अजन्मा और शाश्वत शिव की शरण ग्रहण करता हूँ जो सभी कारणों के भी कारण माने गए हैं।

    वे कल्याणस्वरूप और परम प्रकाश के रूप में वर्णित हैं। वे जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे तुरीय अवस्था से संबंधित परम तत्व हैं।

    वे अज्ञानरूपी अंधकार से परे, आदि और अंत से रहित, पवित्र तथा द्वैत से परे स्वरूप हैं।

    तुरीय का अर्थ

    वेदांत की आध्यात्मिक परंपरा में तुरीय को जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे चेतना की चौथी अवस्था के रूप में समझाया जाता है।

    इसी कारण यह श्लोक शिव के गहरे आध्यात्मिक और अद्वैत स्वरूप की ओर संकेत करता है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 8

    नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते
    नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।
    नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
    नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥८॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    हे सर्वव्यापी प्रभु, हे विश्वरूप! आपको बार-बार प्रणाम है।

    हे चिदानंद स्वरूप भगवान! आपको बार-बार नमन है।

    आप तप और योग के माध्यम से प्राप्त किए जाने वाले परम तत्व हैं। वेदों के ज्ञान और श्रुति परंपरा के माध्यम से जिनका बोध किया जाता है, ऐसे परमेश्वर को बार-बार प्रणाम है।

    यह श्लोक भक्त की विनम्रता और परम तत्व के प्रति पूर्ण श्रद्धा की भावना को व्यक्त करता है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 9

    प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ
    महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र ।
    शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
    त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥९॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    हे त्रिशूलधारी प्रभु! हे सर्वव्यापी विश्वनाथ! हे महादेव, शंभु, महेश और त्रिनेत्रधारी भगवान!

    हे शिवाकांत, शांत स्वरूप, स्मरारि और त्रिपुरारी! भक्त की दृष्टि में आपके अतिरिक्त कोई अन्य परम वरणीय या सर्वोच्च माननीय नहीं है।

    इस श्लोक में भगवान शिव के प्रति एकनिष्ठ भक्ति और पूर्ण समर्पण की भावना दिखाई देती है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 10

    शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे
    गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
    काशीपते करुणया जगदेतदेकं
    त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥१०॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    हे शंभु, हे महेश, हे करुणामय प्रभु! हे शूलपाणि, गौरीपति, पशुपति और काशीपति!

    आपको पशुपाशनाशिन् कहा गया है, अर्थात जीवों को बंधन में रखने वाले पाशों से मुक्त करने वाले।

    हे महेश्वर! जगत के संबंध में सृष्टि, पालन और संहार की परम सत्ता आपके साथ जोड़ी गई है। आप ही सर्वोच्च ईश्वर हैं।

    पशुपाश का आध्यात्मिक अर्थ

    आध्यात्मिक परंपरा में पाश शब्द का संबंध ऐसे बंधनों से भी जोड़ा जाता है जो जीव को उसके वास्तविक स्वरूप के ज्ञान से दूर रखते हैं। इनमें मोह, आसक्ति और अज्ञान जैसी अवधारणाओं को समझा जा सकता है।

    वेदसार शिव स्तवः का श्लोक 11

    त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे
    त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ ।
    त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
    लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥११॥

    सरल हिंदी भावार्थ

    हे देव, हे स्मरारि! इस जगत की उत्पत्ति आपसे मानी गई है।

    हे मृड, हे विश्वनाथ! यह सम्पूर्ण जगत आपमें ही स्थित रहता है।

    हे ईश्वर! अंततः यह जगत आपमें ही विलीन हो जाता है।

    हे हर, हे चराचर विश्वरूप! सम्पूर्ण चर और अचर जगत में आपके व्यापक स्वरूप का स्मरण किया जाता है।

    वेदसार शिव स्तवः में भगवान शिव का स्वरूप

    इस स्तोत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें भगवान शिव के साकार और निराकार दोनों पक्षों का वर्णन मिलता है।

    प्रारंभिक श्लोकों में शिव के परिचित स्वरूप दिखाई देते हैं। वे जटाधारी हैं, गंगाधर हैं, नीलकंठ हैं, त्रिनेत्रधारी हैं, त्रिशूल धारण करते हैं और वृषभ से जुड़े स्वरूप में पूजित होते हैं।

    आगे के श्लोकों में यही शिव निराकार, अजन्मा, सर्वव्यापी और द्वैत से परे परम तत्व के रूप में वर्णित होते हैं।

    इस दृष्टि से स्तोत्र का पाठ केवल नामों का स्मरण नहीं है। यह भक्त को शिव के बाहरी स्वरूप से उनके व्यापक आध्यात्मिक स्वरूप की ओर विचार करने का अवसर भी देता है।

    वेदसार शिव स्तवः का पाठ कैसे करें?

    यदि कोई भक्त इस स्तोत्र का पाठ करना चाहता है तो सबसे महत्वपूर्ण बात श्रद्धा और एकाग्रता है। संस्कृत पाठ करते समय शब्दों का यथासंभव सही उच्चारण करना और उनके अर्थ को समझना उपयोगी हो सकता है।

    यदि इसे किसी विशेष व्रत, पूजा या धार्मिक अनुष्ठान के साथ जोड़ा जा रहा हो, तो उस अनुष्ठान की निर्धारित विधि के लिए संबंधित परंपरा या प्रमाणित धार्मिक स्रोत का संदर्भ लेना उचित है।

    स्तोत्र पाठ को किसी निश्चित भौतिक परिणाम की गारंटी के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय इसे भक्ति, ध्यान, आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना के रूप में समझना अधिक उचित है।

    वेदसार शिव स्तवः का महत्व

    धार्मिक परंपरा में भगवान शिव को अनेक रूपों में आराध्य माना गया है। वे भक्तों के लिए महादेव, पशुपति, विश्वनाथ, नीलकंठ और शंभु जैसे नामों से पूजित हैं।

    वेदसार शिव स्तवः में इन साकार रूपों के साथ शिव को निराकार और सर्वव्यापी परम तत्व के रूप में भी संबोधित किया गया है।

    इसलिए इस स्तोत्र का विशेष भाव भक्ति, समर्पण और शिव-तत्व के चिंतन से जुड़ा हुआ दिखाई देता है

    नीलकंठ शिव का शांत और आध्यात्मिक स्वरूप वेदसार शिव स्तव
    नीलकंठ शिव का शांत और आध्यात्मिक स्वरूप वेदसार शिव स्तव

    वेदसार शिव स्तवः शुद्ध पाठ, सरल हिंदी भावार्थ

    वेदसारशिवस्तवः पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम् ।
    जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम् ॥१॥

    मैं उस भगवान का ध्यान करता हूँ जो समस्त जीवों के स्वामी (पशुपति) हैं, जो हमारे पापों का नाश करते हैं और जो परम दिव्य स्वरूप हैं।
    वे श्रेष्ठ गजचर्म (हाथी की खाल) धारण करते हैं और स्वयं ही सर्वोच्च हैं।
    उनकी जटाओं से पवित्र गंगा का जल प्रवाहित होता है।
    मैं उसी महादेव का एकाग्र मन से ध्यान करता हूँ, जो स्मर (कामदेव, अर्थात इच्छाओं) के शत्रु हैं।

    महेशं सुरेशं सुरारार्तिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम् ।
    विरूपाक्षमिन्द्वर्क वह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम् ॥२॥

    मैं उस भगवान का ध्यान करता हूँ जो कैलाश पर्वत के स्वामी (गिरीश) हैं, जो दिव्य गणों के अधिपति हैं और जिनका कंठ विषपान के कारण नीलवर्ण है।
    वे नंदी, बैलों के राजा, पर आरूढ़ हैं और उनके अनगिनत रूप हैं।
    वे भीतर से शुद्ध चेतना के रूप में प्रकाशमान हैं और बाहर से जिनका शरीर पवित्र भस्म से अलंकृत है।
    वे देवी भवानी के पति हैं—ऐसे पंचमुखी भगवान की मैं पूजा करता हूँ।

    गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गणातीतरूपम् ।
    भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥३॥

    हे शिव! आप कैलाश के स्वामी हैं, गणों के अधिपति और नीलकंठ हैं।
    आप धर्मरूप वृषभ (बैल) पर विराजमान होते हैं और अनंत गुणों से युक्त हैं।
    आप समस्त सृष्टि के आदि कारण और प्रकाश के समान दिव्य स्वरूप हैं।
    आपका शरीर पवित्र भस्म से अलंकृत है और आप माता भवानी के पति हैं।
    ऐसे पंचमुखी प्रभु की मैं भक्तिभाव से उपासना करता हूँ।

    शिवाकान्त शम्भो शशाङ्कार्धमौले महेशान शूलिन् जटाजूटधारिन् ।
    त्वमेको जगद्‍व्यापको विश्वरूप प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥४॥

    हे शिवाकांत, पार्वती के मन को मोहित करने वाले!
    हे शंभु, हे चन्द्रशेखर, हे महादेव!
    आप त्रिशूल धारण करने वाले और जटाओं से विभूषित हैं।
    हे विश्वरूप! आप ही सम्पूर्ण जगत में सर्वव्याप्त हैं।
    हे पूर्णस्वरूप प्रभु! आप मुझ पर कृपा करें, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों।

    परात्मानमेकं जगद्वीजमाद्यं निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम् ।
    यतो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम् ॥५॥

    हे एकमात्र परमात्मा, समस्त जगत के आदि कारण!
    आप इच्छाओं से परे, निराकार और ओंकारस्वरूप हैं।
    आपका साक्षात्कार केवल प्राण और ध्यान के माध्यम से ही संभव है।
    आपसे ही इस समस्त सृष्टि की उत्पत्ति होती है, आप ही उसका पालन करते हैं और अंततः सब कुछ आपमें ही विलीन हो जाता है।
    हे प्रभु! मैं आपकी भक्ति करता हूँ।

    न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर् न चाकाश आस्ते न तन्द्रा न निद्रा ।
    न ग्रीष्मो न शीतो न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्ति तमीडे ॥६॥

    जो न भूमि हैं, न जल, न अग्नि, न वायु और न ही आकाश—अर्थात जो पंचतत्वों से परे हैं।
    जो तन्द्रा, निद्रा, ग्रीष्म और शीत जैसे सभी द्वंद्वों से रहित हैं।
    जो देश, काल और वेश की सीमाओं से भी परे हैं।
    हे निराकार त्रिमूर्ति! मैं आपकी स्तुति करता हूँ।

    अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम् ।
    तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम् ॥७॥

    हे अजन्मा, अनादि और शाश्वत प्रभु! आप नित्य हैं और समस्त कारणों के भी कारण हैं।
    हे कल्याणमूर्ति शिव! आप ही वह परम प्रकाश हैं, जो स्वयं प्रकाशमानों को भी प्रकाश प्रदान करते हैं।
    आप जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओं से परे हैं।
    हे अनादि और अनंत प्रभु! आप अज्ञान से सर्वथा रहित हैं।
    आपके उस परम पवित्र अद्वैत स्वरूप को मेरा नमस्कार है।

    नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते ।
    नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य ॥८॥

    हे विभु, हे विश्वरूप प्रभु! आपको बार-बार नमस्कार है।
    हे समस्त प्राणियों को आनंद देने वाले सदानंद! आपको बार-बार नमस्कार है।
    हे तप, योग और ज्ञान के द्वारा प्राप्त होने वाले प्रभु! आपको बार-बार नमस्कार है।
    हे वेदों के ज्ञान से जानने योग्य परमेश्वर! आपको बार-बार नमस्कार है।

    प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र ।
    शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥९॥

    हे त्रिशूलधारी, हे विभु विश्वनाथ!
    हे महादेव, हे शंभो, हे महेश!
    हे त्रिनेत्र, हे पार्वतीवल्लभ, हे शांत और स्मरणीय प्रभु!
    हे त्रिपुरारी! आपके समक्ष न कोई श्रेष्ठ है, न कोई वरण करने योग्य;
    न कोई मान्य है और न ही कोई आपके समान गणनीय है।

    शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
    काशीपते करुणया जगदेतदेकस् _ त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥१०॥

    हे शंभो, हे महेश, हे करुणामय प्रभु!
    हे शूलपाणि, हे गौरीपति, हे पशुपति, हे काशीपति!
    आप ही समस्त पशुपाश अर्थात् मोह-माया के बंधनों का नाश करने वाले हैं।
    हे दयामय प्रभु! आप ही इस जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के कारण हैं,
    और आप ही इसके एकमात्र स्वामी हैं।

    त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ ।
    त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥११॥

    हे चराचर विश्वरूप प्रभु! आपके लिंगस्वरूप से ही यह सम्पूर्ण जगत उत्पन्न होकर अस्तित्व में आता है।
    हे शंकर, हे विश्वनाथ! उत्पन्न होने के पश्चात यह सारा जगत आपमें ही स्थित रहता है, अर्थात आप ही इसका पालन करते हैं।
    और अंततः यह सम्पूर्ण सृष्टि आपमें ही विलीन हो जाती है।

    वेदसार शिवस्तव का सार एवं महिमा

    वेदसार शिवस्तव भगवान शिव की महिमा का सुंदर स्तवन है, जिसे आदिगुरु शंकराचार्य ने उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए रचा था।
    इस स्तुति में बताया गया है कि संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति भगवान शिव से ही होती है और अंत में सब कुछ उन्हीं में समा जाता है।

    शिव देवताओं के भी देव हैं, इसलिए उन्हें महादेव कहा जाता है। वे ऐसे हैं जो देवताओं के दुःखों को भी दूर करते हैं।
    महादेव होते हुए भी उनका स्वरूप बहुत सरल और विरक्त है—वे बाघम्बर धारण करते हैं और भस्म से विभूषित रहते हैं।

    फिर भी वे माता पार्वती के प्रिय हैं और उनके हृदय को मोह लेने वाले हैं।
    तीनों लोकों के कल्याण के लिए उन्होंने विषपान कर उसे अपने कंठ में धारण किया, इसी कारण वे नीलकंठ कहलाते हैं।

    यह स्तुति भगवान शिव के उन अद्भुत और योगी स्वरूपों का वर्णन करती है, जो उन्हें सबसे अलग और महान बनाते हैं।

    स्रोत और संपादकीय जानकारी

    इस लेख में दिए गए संस्कृत श्लोकों का पाठ और उनका हिंदी भावार्थ पाठकों की सुविधा के लिए प्रस्तुत किया गया है। संस्कृत पाठ में पाठांतर की संभावना को देखते हुए प्रकाशित संस्करण में श्लोकों की वर्तनी और क्रम को किसी प्रमाणित ग्रंथ या विश्वसनीय धार्मिक स्रोत से अवश्य मिलाया जाना चाहिए।

    Vatsa Bhakti का उद्देश्य धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल हिंदी में समझने योग्य रूप में प्रस्तुत करना है। जहां किसी विषय में अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में मतभेद हो सकते हैं, वहां उन्हें अंतिम या एकमात्र सत्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संबंधित परंपरा के संदर्भ में समझना उचित है।

    DOWNLOAD वेदसार शिव स्तवः शुद्ध पाठ

    भगवान शिव के अन्य मंत्र