हिंदू धर्म में माता पार्वती, जिन्हें हम ‘गिरजा’ (पर्वत की पुत्री) के नाम से भी जानते हैं, शक्ति और समर्पण का साक्षात स्वरूप हैं। श्रीरामचरितमानस के ‘बालकांड’ में वर्णित गिरजा स्तुति न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह उन सभी के लिए एक मार्गदर्शिका है जो जीवन में सच्चे प्रेम और मानसिक शांति की तलाश में हैं। जय जय गिरिवर राज किशोरी (गौरी स्तुति) श्री रामचरितमानस के बालकाण्ड का एक अत्यंत भक्तिमय और दिव्य अंश है। जब सीता जी पुष्पवाटिका में श्री राम को देखने के बाद माँ गौरी के मंदिर जाकर उनकी वंदना करती हैं, तब वे इन पदों का गान करती हैं।
आदरणीय राजन जी महाराज जैसे विद्वानों का यह मत है कि इस स्तुति में इतनी शक्ति है कि यह भक्त के हृदय में वही सात्विक ऊर्जा जाग्रत कर देती है जो दुर्गा सप्तशती के पूर्ण पाठ से मिलती है।

माता सीता ने किया था इस स्तुति का पाठ
मान्यता है कि जब माता सीता पुष्प वाटिका में श्री राम को पहली बार देखती हैं, तब वे गौरी पूजन के समय इसी स्तुति का गान करती हैं। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर माता गिरजा ने उन्हें मनचाहा वर (प्रभु श्री राम) प्राप्त होने का आशीर्वाद दिया था। इस स्तुति का एक-एक शब्द सिद्ध है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसके बाद जो लिखा है, वह इस पाठ की महिमा को पूर्ण करता है:
“विनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥”
अर्थात्, सीता जी की इस स्तुति से प्रसन्न होकर माँ गौरी की मूर्ति से माला गिर गई और वे मुस्कुरा दीं। यह इस बात का प्रमाण है कि जो कोई भी भक्त सच्चे प्रेम और विनय के साथ इन पंक्तियों को दोहराता है, उसे माँ का आशीर्वाद और “मनचाहा वर” (इच्छित फल) अवश्य प्राप्त होता है।
जय जय गिरिवर राज किशोरी (सीता जी द्वारा गिरजा स्तुति)- Jai Jai Girivar Raj Kishori
जय -जय गिरिवर राज किशोरी ।
जय महेश मुख चन्द चकोरी।।
जय गजबदन षडाननमाता ।
जगत जननी दामिनी दुति गाता।।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना ।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ।।
भव भव विभव पराभव कारिनि।
विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।
दोहा-
पति देवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस् सारदा सेष।।
सेवत तोहि सुलभ फल चारी।
बरदायनी पुरारी पिआरी।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे ।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
मोर मनोरथु जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबहीं के ।।
कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं।
अस कहि चरन गहे बैदेही ।।
बिनय प्रेम बस भई भवानी ।
खसी माल मूरति मुसकानी ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ।
बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ।।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी ।
पूजिहिं मनकामना तुम्हारी ।।
नारद बचन सदा सुचि साचा ।
सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा ।।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेह जानत रावरो ।।
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ।।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाय कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।
गौरी स्तुति की महिमा और प्रभाव
इस स्तुति को ‘सिद्ध स्तुति’ माना गया है। इसके प्रमुख लाभ और महिमा के बिंदु निम्नलिखित हैं:
- दुर्गा सप्तशती के तुल्य फल: माना जाता है कि यदि आपके पास समय का अभाव है या आप संस्कृत के कठिन मंत्रों का उच्चारण नहीं कर पा रहे हैं, तो पूर्ण श्रद्धा से इस चौपाई और छंद का पाठ करने पर माँ दुर्गा की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है।
- मनोकामना पूर्ति: सीता जी ने इस स्तुति के माध्यम से भगवान श्री राम को वर रूप में प्राप्त किया था। इसलिए, सुयोग्य वर या वधू की प्राप्ति और विवाह की बाधाओं को दूर करने के लिए यह अचूक उपाय माना जाता है।
- भय और क्लेश का नाश: “देवी पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥” इस स्तुति का गान करने से मन का भय समाप्त होता है और पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि होती है।
- सफलता की प्राप्ति: किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले माँ गौरी की यह स्तुति करने से कार्य निर्विघ्न संपन्न होता है।
पाठ करने की विधि
राजन जी महाराज और अन्य संत जन इसे सिद्ध करने के लिए कुछ सरल सुझाव देते हैं:
- नियमितता: इसे प्रतिदिन सुबह या शाम को माँ गौरी या दुर्गा जी की प्रतिमा के सम्मुख दीप प्रज्वलित कर पढ़ें।
- शुद्ध भाव: स्तुति करते समय मन में वही करुणा और समर्पण रखें जो माता सीता के हृदय में था।
- विश्वास: “मोर मनोरथु जानहु नीके। बसहु सदा उर पुर सबही के॥” इस भाव के साथ पाठ करें कि माँ हमारे मन की बात पहले से जानती हैं और वे कल्याणकारी मार्ग ही प्रशस्त करेंगी।
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